जब बच्चा नहीं सीखता, तो सवाल किससे पूछना चाहिए?
“सर, जब इतने सालों से स्कूल में पढ़ाने वाले अनुभवी शिक्षक इन बच्चों को नहीं पढ़ा पाए, तो हम कैसे पढ़ा पाएँगे?”
स्कूल अनुभव कार्यक्रम के दौरान मेरे विद्यार्थियों ने मुझसे यह सवाल पूछा। उन्हें ऐसे बच्चों के साथ काम करने की जिम्मेदारी मिली है जो अभी भी बुनियादी पढ़ने-लिखने के स्तर तक नहीं पहुँच पाए हैं। निपुण के संदर्भ में उन्हें इन बच्चों के साथ बैठना है, उन्हें पढ़ाना है, उनकी मदद करनी है। सवाल में एक तरह की हिचकिचाहट थी, लेकिन उसके पीछे एक गहरी धारणा भी थी—अगर इतने अनुभवी लोग असफल रहे हैं, तो शायद समस्या बच्चे में ही है। मैंने उनसे कहा, शायद हमें सवाल थोड़ा बदलकर पूछना चाहिए। यह पूछने के बजाय कि “यह बच्चा क्यों नहीं सीख रहा?”, कभी यह भी पूछकर देखिए कि “अब तक इसे सीखने के कितने अलग-अलग मौके मिले हैं?” शिक्षण में सबसे खतरनाक निष्कर्ष वह है जब हम किसी बच्चे के बारे में कह देते हैं—“यह सीखने वाला बच्चा नहीं है।” क्योंकि उस एक वाक्य के बाद केवल बच्चे की संभावना खत्म नहीं होती, शिक्षक की अपनी सीखने की यात्रा भी रुक जाती है। फिर शिक्षक के पास अपनी भाषा बदलने, तरीका बदलने, प्रयोग करने या खुद से यह पूछने की कोई वजह नहीं बचती कि मैं और क्या कर सकता हूँ? असफलता का कारण तय हो चुका है—बच्चा ही नहीं सीख सकता।
बच्चे अपने बारे में वही मानने लगते हैं जो दुनिया उन्हें बार-बार बताती है। अगर किसी बच्चे को लगातार सुनना पड़े—“तुम्हें पढ़ना नहीं आता”, “तुमसे नहीं होगा”, “तुम बहुत कमजोर हो”—तो धीरे-धीरे ये बातें बाहर से आती हुई आवाज़ें नहीं रह जातीं; वे उसके भीतर की आवाज़ बन जाती हैं। वह खुद कहने लगता है—“मैं नहीं सीख सकता।” और यहीं से सीखने की समस्या एक गहरी मनोवैज्ञानिक समस्या में बदल जाती है। कल्पना कीजिए, एक बच्चा कई वर्षों से पढ़ने में संघर्ष कर रहा है। हर बार किताब खुलती है और उसके सामने उसकी असफलता खड़ी हो जाती है। हर गलत उत्तर के साथ उसे यह एहसास कराया जाता है कि वह बाकी बच्चों से पीछे है। एक समय के बाद वह किताब से नहीं, उस पूरे अनुभव से बचने लगता है। वह पढ़ना नहीं छोड़ता; वह उस स्थिति से बचना शुरू करता है जिसमें उसे बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि वह पढ़ नहीं सकता। खासकर 10–12 साल की उम्र में यह और जटिल हो जाता है। इस उम्र तक बच्चे में अपने ‘स्व’ की समझ आ चुकी होती है। उसे पता होता है कि दूसरे उसके बारे में क्या सोचते हैं। इसलिए किसी शिक्षक के सामने पढ़ न पाना केवल एक शैक्षणिक असफलता नहीं रह जाती; वह उसके आत्मसम्मान पर चोट बन सकती है। फिर वह उस शिक्षक से, उस किताब से और धीरे-धीरे सीखने की पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाने लगता है। इसलिए शायद इन बच्चों के साथ हमारा पहला काम उन्हें पढ़ाना नहीं, बल्कि उनके भीतर जमा उस विश्वास को थोड़ा-थोड़ा तोड़ना है कि “मैं सीख नहीं सकता।”
शिक्षण कोई ऐसी गोली नहीं है जिसका एक निश्चित डोज हो और हर बच्चा ठीक हो जाए। मैं खुद नहीं मानता कि मेरे पास कोई ऐसी जादुई भाषा है जो हर बच्चे को तुरंत बदल सकती है। कई बार बहुत सोच-समझकर कही गई बात का कोई असर नहीं होता और कभी एक मामूली-सा वाक्य बच्चे के भीतर कुछ बदल देता है। किसी बच्चे से यह कहना कि “अभी तक काम पूरा क्यों नहीं किया?” और यह कहना कि “देखो, 90 प्रतिशत तो हो गया है, अब थोड़ा-सा ही बचा है”—दोनों में सूचना लगभग एक ही है, लेकिन बच्चे के भीतर पैदा होने वाली तस्वीर बिल्कुल अलग हो सकती है। पहले वाक्य में उसकी कमी दिखाई देती है, दूसरे में उसकी उपलब्धि। शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह हमारे सामने खुली हुई किताब नहीं है। हम बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम अभी भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। और शायद यही इसकी सबसे अच्छी बात है। क्योंकि जहाँ सब कुछ पहले से तय नहीं है, वहीं प्रयोग की संभावना है। वहाँ असफल होने की संभावना है और फिर कुछ नया खोजने की संभावना भी है। इसलिए इन बच्चों के साथ काम करना केवल उनका सीखना नहीं है; यह आपके अपने शिक्षक बनने की प्रयोगशाला भी है। आप नहीं जानते कि कौन-सा तरीका काम करेगा। लेकिन आपको यह जरूर जानना चाहिए कि एक तरीका काम नहीं कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चा सीख नहीं सकता।
इस यात्रा में आपको बार-बार एक वाक्य सुनाई देगा—“यह बच्चा पढ़ने वाला नहीं है।” मैं चाहता हूँ कि आप इस वाक्य से अपने आपको बचाएँ। क्योंकि जैसे ही आपने इसे सच मान लिया, आपने अपनी संभावनाओं का दरवाज़ा बंद कर दिया। बच्चा नहीं सीख रहा है तो शिक्षक को भी अपने आप से सवाल पूछना चाहिए—क्या मेरी भाषा सही है? क्या मेरा तरीका सही है? क्या मैं उसे पर्याप्त समय दे रहा हूँ? क्या मैंने उसकी छोटी-सी प्रगति को भी पहचानना सीखा है? क्या मैं उसे उसकी असफलताओं से अलग पहचान सकता हूँ? इसका अर्थ यह नहीं कि एक अच्छा शिक्षक कभी गुस्सा नहीं करेगा या कभी गलती नहीं करेगा। हम सब करते हैं। लेकिन शिक्षक होने का अर्थ शायद यही है कि हम अपनी गलतियों को भी सीखने की सामग्री बना सकें। अगर कभी डाँटने के बाद हमें यह महसूस हो कि बात नहीं बनी, तो यह कह देना आसान है कि “बच्चा ही नहीं सुनता।” मुश्किल काम है यह पूछना—“क्या मेरे पास उस बच्चे तक पहुँचने की सही भाषा थी?” यही प्रश्न शिक्षक को आगे बढ़ाता है। सीखने के लिए खुला रहना ही शायद शिक्षक की सबसे बड़ी योग्यता है।
और शायद इन बच्चों के साथ आपका सबसे महत्वपूर्ण काम अक्षर और शब्द सिखाने से थोड़ा बड़ा है। आप उनके जीवन में यह दिखाने वाले व्यक्ति भी हो सकते हैं कि दुनिया केवल डाँट, डर और अपमान से नहीं बनी है। हो सकता है कि उनके दिन के चौबीस घंटों में आपके साथ बिताया हुआ एक घंटा ही ऐसा हो जिसमें कोई उन्हें बिना अपमानित किए सुनता हो; उनकी छोटी-सी सफलता को भी सफलता मानता हो; उनकी गलती को उनकी पहचान नहीं बनाता हो और उनसे कहता हो—“चलो, एक बार और कोशिश करते हैं।” आप उनकी पूरी जिंदगी नहीं बदल सकते। आपको ऐसा करने का दावा भी नहीं करना चाहिए। लेकिन आप उनके जीवन में एक वैकल्पिक अनुभव जरूर बन सकते हैं। एक ऐसा अनुभव जो उन्हें यह विश्वास दिलाए कि सम्मान से भी बात की जा सकती है, गलती करना अंत नहीं है, सीखने में समय लग सकता है और सबसे महत्वपूर्ण—वे सीख सकते हैं। ये बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहेंगे। कल वे हमारे सहकर्मी होंगे, किसी दिन हमारे साथ काम करेंगे, किसी दिन हमारे सामने किसी और भूमिका में होंगे। आज हम उनके भीतर जो दुनिया रख रहे हैं, संभव है कल वे उसी दुनिया को आगे बढ़ाएँ। इसलिए जब कोई कहे, “यह बच्चा नहीं सीख सकता”, तो शायद शिक्षक का सबसे महत्वपूर्ण उत्तर यही होना चाहिए—“मुझे अभी नहीं पता कि यह बच्चा कितना सीख सकता है। लेकिन मैं यह तय करने वाला कौन होता हूँ कि वह नहीं सीख सकता?” शायद एक शिक्षक की असली शुरुआत वहीं होती है—जहाँ वह बच्चे की सीमा तय करने के बजाय अपनी कोशिश की सीमा को चुनौती देता है।
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