एक खिड़की थी... हां...बहुत दूर तक जाने के लिए, बहुत ऊंचा उठना पड़ता है!
क्या हो जब काम खत्म हो जाए? क्या हो जब काम का ध्यान ना रहे?? बस कुछ ऐसा ही हुआ था! मेरी दूर तक जाने की इच्छा हुई और ऊपर उठने के लिए सीढ़ियां थी ही। क्योंकि नज़ारे दूर तक देखने थे इसलिए मैं ऊपर वाली मंज़िल पर जा पहुंची! पर अब भी कुछ छूट रहा था शायद उस पार की दुनिया को देखने का रास्ता...! उस छोटे कमरे की एक खिड़की से मेरी जान पहचान थोड़े दिन पहले ही बनी थी, उसी रिश्ते को बचाए रखने के लिए उसने खुद को खोलने में ज़रा भी संकोच नहीं किया और इस तरह से मैं चंद पलो में अपनी दुनिया, अपने दायरे भूल गई।