क्या हो जब काम खत्म हो जाए? क्या हो जब काम का ध्यान ना रहे?? बस कुछ ऐसा ही हुआ था! मेरी दूर तक जाने की इच्छा हुई और ऊपर उठने के लिए सीढ़ियां थी ही। क्योंकि नज़ारे दूर तक देखने थे इसलिए मैं ऊपर वाली मंज़िल पर जा पहुंची! पर अब भी कुछ छूट रहा था शायद उस पार की दुनिया को देखने का रास्ता...! उस छोटे कमरे की एक खिड़की से मेरी जान पहचान थोड़े दिन पहले ही बनी थी, उसी रिश्ते को बचाए रखने के लिए उसने खुद को खोलने में ज़रा भी संकोच नहीं किया और इस तरह से मैं चंद पलो में अपनी दुनिया, अपने दायरे भूल गई।
कितना मुश्किल होता है सिमटी हुई दहलीज़ को नकारना, तोड़ना उस चरम को जिसे बांधा गया हो ठीक वैसे ही जैसे किसी कमरे के एक छोटे से छेद में किसी का आसमान बंध जाता है... मैं बंध जाती हूं। उस रेखा को मैं मिटा तो नहीं सकती, जिसने मुझे दूसरी दुनिया में जाने से रोका था इसलिए मैं उसके बातों के ढेर को अक्सर खिड़की से सुन लिया करती थी। एक दिन जब मैं घर का काम निपटा कर ऊपर उठ जाने के अनोखे सपने देख रही थी तभी ख्याल उमड़ा, कि मैं क्यों नहीं उस दुनिया को पा सकती हूं जिसके खामोश अल्फाजों को मैंने, पोटली में बांध कर कोने वाली उस खिड़की पर टांग रखा है....इसी सिलसिले को कायम रखते हुए जब कभी दोपहर में खिड़की के पास खड़ी होती तो एक सन्नाटा सामने बिखरा पड़ा मिलता। शायद बच्चों की गर्मियों की छुट्टियां बड़ों ने भी स्वीकार कर ली या फिर मेरा ऊपर उठना उनसे देखा ना गया हो। शाम तक के इंतजार में ना जाने मैंने ऐसे कितने ख्यालों को जीवंत कर बह जाने दिया, यह मेरी विशाल हृदयता नहीं तो और क्या है!
शाम हुई, सहसा गली चीख उठी, मानो दूसरी दुनिया से मुझे पुकार रही हो। मैंने प्रेमपूर्वक अपना हाथ हवा में हिला दिया और एक मुस्कुराहट उन लोगों तक गुप्त साधन के ज़रिए भेज दी। धीरे-धीरे बातों का ढ़ेर शुरू हुआ और मैंने दोनों दुनिया की सीमाओं का एकीकरण ... अकारण ही शुरू कर दिया। तभी कुछ जानी पहचानी आवाज़ सुनाई दी....दरवाजे पर कोई था जो मुझे मेरी दुनिया में आने की चेतावनी दे रहा था। आंखों में भय गहरा चुका था, दूसरी दुनिया मेरा तिरस्कार कर रही थी। हवाओं का रुख भी कुछ यूं बदला, मानो मैं अभागिन उसकी सभी अड़चनों का जड़ थी। खिड़की ने अस्वीकार्य दृष्टि से दूसरी दुनिया को देखा और उनकी प्रथाओं को धिक्कारते हुए मेरे साथ आ खड़ी हुई।
अब उस कमरे में जिसका आसमान सिमटा था, जिसकी खिड़की पर टंगी पोटली में दूसरी दुनिया के लोगों की बातों का ढ़ेर था, जिस कमरे की अपनी एक दहलीज़ थी, जिसके पास मरी हुई ख्वाहिशों का अंतिम संस्कार करने का अधिकार भी ना था, जिस कमरे में उस अज्ञात स्त्री की दुनिया बसती थी.... दरवाज़े की एक असहज दस्तक ने उस स्त्री के सभी दायरे निर्धारित कर दिए।
उस कमरे में वो स्त्री रहती थी....एक खिड़की, मारी हुई ख्वाहिशों और छोटे से छेद से दिखते आसमान के साथ जिसे दूर तक देखना पसंद था और जिसके लिए वह ऊपर उठ जाना चाहती थी।
--अर्चिता त्रिपाठी
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