सुलझी हुई उलझन: अस्तित्व और ‘मैं’
अर्चिता त्रिपाठी
हवाओं का कलरव, आसमाँ की नादानियाँ
बहुत से तुम-से बनी हैं, मेरी बहुत-सी कहानियाँ
अस्तित्व की पहचान के लिए बढ़ना आज सम्भवतः बेबुनियादी भी है और यकीनन अनिवार्य भी! बेबुनियादी शायद इसलिए क्यूंकि " हम" अब बचा नहीं और "मैं" की परिभाषा में मेरे सिवाय सबकुछ है। रही बात अनिवार्य की, तो अनिवार्य इसलिए क्यूंकि खुद को पाए बिना जहां पा लेने पर भी हमारा शेष कुछ नहीं...! निश्चित तौर पर आंकड़े दर्ज करना सम्भव नहीं मगर बीते वर्षों का अवलोकन यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि सबको सफल होना है, स्वयं पर विजयी हुए बिना। बिल्कुल! इसे नकारा जा सकता है मगर इसकी यथार्थ अवधारणा, चिर् काल से अमरता तक स्थायी बनी हुई है। सफलता के शिखर से साक्षात्कार करने वालों ने भी अपनी किताबों में अक्सर उल्लिखित किया है कि उन्होंने स्वयं को कैसे हराया, ना कि दुनिया को कैसे जीता जा सकता है। यहीं से विचारो की भिन्न श्रेणियां उभरनी शुरू होती हैं और प्रश्न अस्तित्व की पहचान पर आ खड़ा मिलता है।
अस्तित्व की कोई मूल संरचना तो मुझे ज्ञात नहीं मगर अपने वितरित दृष्टीकोण से इसे क्षितिज की संज्ञा देना गलत नहीं। अस्तित्व, क्षितिज की ही भांति दृष्टिगत भी है और दुर्गम भी, यह हमें विश्वास दिलाता है कि हम स्वयं को पहचानते हैं मगर ज़मी का आसमाँ तक सफ़र क्षणभर का लक्ष्य नहीं होता। क्षितिज की ही तरह अस्तित्व भी अपने आप में विशाल है जिसे पूर्णतः समझना और अभिव्यक्त करना सरलतम संघर्ष है। अस्तित्व पहचान की यह यात्रा स्वाभाविक रूप से कुछ मूल प्रश्नो से आरंभ होती है जैसे "मैं कौन हूँ?" अथवा "मेरी पहचान क्या है?" अपनी एक कविता पर विचार करते समय सहसा यह प्रश्न उभरें जो दिखने में जितने सरल है, उतने ही गहन एवं विचारणीय। (आपके समक्ष प्रस्तुत यह लेखनी, उपरोक्त प्रश्नो को उद्देश्य मानकर चिंतन के लिए अभिप्रेरित करने की भावना से दर्ज की गयी है।)
तत्त्वमीमांसा/अस्तित्ववाद के भीतर भी आत्मा, चेतना और स्व के अस्तित्व पर ढेरों चर्चाएं मिलती हैं। सबके अपने अलग मत है...किसी के लिए भौतिक शरीर ही चेतना है तो कोई द्वैतवाद का समर्थन करता है। ठहरकर दर्शनशास्त्र के तर्को को गौर से देखने पर कभी किसी पक्ष पर सहमति बनती है तो कभी एक नई अवधारणा निकलकर सामने आती। कभी कुछ हद तक द्वैतवाद सही लगता...जिसमें भौतिक शरीर, अवचेतन मन के नियंत्रण में होता और जो आवश्यकताओं तथा अनावश्यक इच्छाओं में विभेदीकरण करता है तो कभी मैं ही अस्तित्व के रूप मे दिखाई देता। यही एक उलझन कभी अस्तित्व के गंतव्य को पूर्ण नहीं होने देती।
सामान्यतः हम अपने भौतिक शरीर, गुणों, उपलब्धियों और नाम को अपने अस्तित्व की पहचान मानने लगते हैं....मगर क्या नश्वरता, अस्तित्व का पर्याय हो सकता है? सम्भवतः नहीं तो आखिर अस्तित्व और उसके अंदर मौजूद " मैं " क्या है? जैसा की पहले भी बताया गया है कि जब हम वस्तुओं को समेटने का प्रयत्न करते हैं तो उसमें मौजूद हर तत्त्व बिखरने को अपना अंत मान लेता है। कुछ ऐसा ही अस्तित्व संबंधी प्रश्नो के साथ हुआ। अपने अस्तित्व को जानने में, समझने में, मैं जितना खुद को खर्च करती गयी उतनी ही उलझने बढ़ी, नए निष्कर्ष निकाले गये और यकीनन यात्रा को स्थगित करने के ख्याल पनपे। अस्तित्व पहचान की राह पर चलने वाले मुझ जैसे अनेक राही इस भावना से परिचित होंगे।
अंततः अपनी सुलझी उलझनों को समेटते हुए तथाकथित रूप में स्वयं को परिभाषित करने का अंकन ठीक उसी प्रकार का क्रम है जिस प्रकार कोई राही समान दिशा देखकर सरल पथ का चयन करता है बिना यह विचार किए कि समान दिशा की ओर उन्मुख दो भिन्न रास्ते, अपने गंतव्य में भी भिन्न होंगे! व्यक्तिगत भिन्नताओं ने अलग मत दिए और उनसे निकाले गए निष्कर्ष "मैं" को अलग ढंग से प्रदर्शित करते हैं। गत वर्षों मे खरीदे अनुभवों का कुछ हिस्सा मेरे अस्तित्व को विचार मानता है!
मेरे अस्तित्व का मूल्य निश्चित तौर पर विचारों तक सीमित है! अपने इस निष्कर्ष से मैं पूर्णतः सहमत भी हूँ....यह दर्शाता है कि मेरा भौतिक शरीर केवल मेरे नाम का प्रतिनिधित्व करता है, मेरे अस्तित्व के विचार को साकार करने में सहायक कर्मी की भूमिका अदा करता है जबकि स्वयं मेरा "मैं" केवल प्रत्यक्ष विचार है। जिस क्षण दर्शकों अथवा श्रोताओं की चेतना, मेरे उपस्थित होने के विचार को नकार देगी उस पल मेरे "मैं" होने का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। एक लेखिका के भीतर मौजूद दार्शनिक दृष्टीकोण, अस्तित्व के केवल विचार होने की अवधारणा को असत्य के समतुल्य दर्शाने में विफल रहा....मगर कुछ प्रश्न अब भी शेष हैं जो इस अनंत यात्रा के स्थगन को नामंजूर करते हैं।
विचारों से शुरू मेरे अस्तित्व की यात्रा ने, मेरे अस्तित्व को विचार बना दिया.....क्या सचमुच मेरे मैं होने का एहसास किसी के जीवंत विचारों पर निर्भर करता है??
[वे पंक्तियाँ, जिसने अस्तित्व की चर्चा के इस अंकन को सुनिश्चित किया...]
ये सुलझी हुई उलझन,
फ़िर कभी नहीं सुलझी
खुद में जो उलझी,
कि फिर मैं कभी नहीं उलझी!
--अर्चिता त्रिपाठी
- Log in to post comments