Stories from the grass roots

समावेशी समाज के लिए जरूरी है सरकारी स्कूलों का अस्तित्व।

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पिछले वर्ष मैंने अपनी बेटी का दाखिला एक सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में करा दिया। अपनी बेटी को प्राइवेट स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में कराने का मेरा निर्णय सिर्फ़ आर्थिक कारणों से नहीं था। मैं चाहता था कि बेटी समाज की वास्तविकता और विविधता में रहकर सीखे। वह समझ सके कि हम जैसे मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से अलग ढर्रे पर चलने वाली दुनिया भी अस्तित्व में है। वह जान सके कि दुनिया की बहुरंगी वास्तविकताएं और जरूरतें हैं। लोगों का आचार- विचार- व्यवहार बहुत हद तक इन्हीं सबसे निर्धारित होता है। वह यह भी जान सके कि इनमें से कुछ भिन्नताओं को हम इंसानों ने ही स्वार्थवश गढ़ा है जो विषमता और अन्याय को बढ़ाती हैं। इनका नाश भी हमें ही करना है। वहीं वह यह भी समझे कि बहुत सी विविधताएं स्वभाविक हैं और वे हमारे जीवन को स्मृद्ध ही करती हैं।


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सामाजिक विज्ञान में अवधारणा की समझ

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मुझे इस विषय की महत्ता अन्य विषयों की तुलना में कहीं अधिक लगती है। हो सकता है आप इससे सहमत ना हो, पर मेरे पास इसके लिए पर्याप्त तर्क है। संसार कभी भी केवल अविष्कारों, जानकारियों या परिभाषीय ज्ञान से संचालित या प्रभावित नहीं हुआ है, महत्वपूर्ण यह रहा है कि इनकी दिशा क्या थी? क्या है? और क्या होगी? यही कारण है कि जैसे-जैसे मनुष्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और तकनीकी दुनिया में आगे बढ़ता जा रहा है मानव – एक सभ्यता, एक प्रजाति और एक संस्कृति के रूप में पिछड़ता जा रहा है।
हर एक नया आविष्कार जैसे प्रकृति के दोहन व स्वयं मानव के पतन का एक नया मार्ग खोलता सा प्रतीत होता है। पर मैं फिर कहूंगी कमी ज्ञान में नहीं अपितु उसकी दिशा में है। सामाजिक विज्ञान विषय का अध्ययन व इसे अन्य विषयों के साथ समग्रता से जोड़ना इस समस्या का निदान हो सकता है। पर यहाँ एक गंभीर रुकावट है वही – ‘अवधारणा’ की।


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उमीद की किरण

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आज के इस दौर में, जहाँ कई कारणों से सरकारी विद्यालयों के प्रति समाज में अविश्वास पनपा हैI या यूं कहें की निजीकरण के दौर में जहाँ, सरकारी विद्यालय संसाधनों और अध्यापकों की तंगी से जूझ रहे हैंI जब सरकारी विद्यालयों में लगातार छात्रों की संख्या घट रही है, ऐसे में दिल्ली में शिक्षा का बजट 25% होना उम्मीद की किरण जगा रहा थाI दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों के क्रम में, दिल्ली शिक्षा विभाग के मेंटर शिक्षकों का एक समूह, जनवरी 2019 में महाराष्ट्र के जिला सतारा तथा जिला परभणी में राष्ट्रीय शैक्षिक भ्रमण पर भेजा गया, ताकि देश के कोने-कोने में हो रहे, सकारात्मक प्रयासों को प्रत्यक्ष रूप में देखकर कुछ सीखा जा सकेI उसी यात्रा में हम कुछ ऐसे सरकारी स्कूलों में गए जोकि ऐसे समय में सचमुच शैक्षिक क्रांति की एक मशाल जलाये हुए है I जहाँ सरकारी विद्यालाओं में कार्यरत शिक्षकों, स्थानीय लोगों और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने मिलकर, कुछ स्कूलों में ऐसा कुछ कर दिखाया है, कि जिससे न केवल सरकारी स्कूलों में समाज का विशवास बढ़ा है, बल्कि “उम्मीद की नई किरण” भी दिखी है I


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Managing time for MATH or Managing Math for TIME

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A child starts using Math even before learning a native language. A toddler prefers to go towards a box containing 4 candies than to a box containing 2 candies. But as the child grows and starts doing the math operation with a tag of the subject Mathematics, the interest starts diminishing. After researching, I realized that the external factors play a vital role behind this aversion towards Mathematics. Unfortunately, the external factors are the people the child trusts the most i.e. the parents and the teachers. Although unconsciously, their advice about Math builds a monster like image about the subject. Statements like, “Math is a very important subject” or “You need to do extensive practice of Math sums to succeed”, builds a notion about Math being something from another planet and the child has to fight a battle against it to be successful in life. As a result, many students find Math problems like a Hercules task


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केरल डायरी:- केरल का सशक्त शिक्षा माॅडल बने पब्लिक डिस्कोर्स का हिस्सा

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हम दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का एक समूह हाल ही में (मार्च 2020 के शुरुआती हिस्से में) केरल की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को समझने के लिए औपचारिक शैक्षिक भ्रमण पर गया था। इस विजिट में हमने वहाँ के सार्वजनिक शिक्षा की मजबूत और दीर्घ विरासत को समझने का प्रयास किया। इसके लिए वहाँ की एससीईआरटी, डायट संस्थान, निगम कार्यालय, पंचायत भवन और कुछ स्कूलों का दौरा किया। केरल अपनी खूबसूरत प्राकृतिक छटा के साथ-साथ शैक्षिक और सामाजिक संपदा से मन को मोह गया।
इस दौरे में जिन अलग-अलग जगहों पर हम गये उनमें जो बातें एक जैसी थीं, वे थीं- सिद्धांतों और व्यवहार में साम्यता, गर्मजोशी भरा स्वागत, विनम्रता और हायरारिकी या पदानुक्रम का मानवीयकरण। इसे हमने ऐसे महसूस किया कि जो कुछ एससीईआरटी और डायट की प्रस्तुति में हमें बताया गया वह स्कूलों, निगमों व पंचायतों की कार्यप्रणाली में प्रतिबिंबित होता हुआ दिखाई दिया। हमें जितने भी शिक्षा अधिकारी, प्रधानाचार्य, शिक्षक मिले सब बहुत गर्मजोशी और आवभगत की मुद्रा में मिले। उनके व्यवहार में रूखे पदानुक्रम की झलक नहीं थी। वे घुल-मिल कर जहाँ अपने शिक्षा माॅडल को हमसे साझा कर रहे थे वहीं दिल्ली में हो रहे नवोन्मेषी कार्यक्रमों की जानकारी भी ले रहे थे। हैरानी की बात थी कि वे हमारी शैक्षिक प्रक्रियाओं और उपलब्धियों से बहुत हद तक परिचित भी थे।


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Teachers, Write…!

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Teaching as a profession has undergone a sea change in the last few decades,
not just in Delhi, but also other parts of the world. Unchecked growth of
materialism, social media explosion and degradation of the environment have
brought humanity at cross roads. It becomes imperative that education also
takes the onus of tackling these challenges and create a win-win situation for
all. Teachers on their part are being hailed as change makers with super
powers, who can usher in a new world.
But, how can we do all this when we keep our classroom doors locked for each
other, don’t seek feedback or in-service professional development in earnest.


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बच्चे कोरे कागज नहीं

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बच्चों को बच्चा तो समझा जाना चाहिये पर बच्चे का मतलब अनाड़ी नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि उन्हें हमें अपने परिवेश का जीवंत सामाजिक- साँस्कृतिक इकाई मानकर आगे बढ़ना होगा। एक ऐसी इकाई जो अपने अवलोकन, अवसरों के दोहन, गलतियों और प्रयासों से निरंतर सीखती है। सीखने की यह प्रक्रिया समता, स्वतंत्रता से पूर्ण वातावरण में संपन्न की जानी चाहिए। आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस इकाइयां ही न्याय और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक समष्टि का निर्माण करेंगी जोकि अभी तक विषमता, वर्चस्व और अन्याय पर टिकी हुई है।


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सरकारी स्कूलों पर विश्वास बहाली का दस्तावेज है पुस्तक- ‘उम्मीद की पाठशाला’

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सरकारी स्कूलों की वर्तमान दुर्दशा की कहानी से कौन परिचित नहीं है? वास्तव में यह कहानी हमारे अपने समाज और उसके सपनों के पतन की कहानी ही है। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूली व्यवस्था कभी पूर्ण संपन्न रूप से अपने उरूज पर थी और अब वह अपनी संपन्नता से लुढ़क कर रसातल को चली आई है। कमोबेश अपनी संसाधन क्षमता और भूमिका में वह बहुत अच्छी स्थिति में कभी भी नहीं थी। पर सत्तर-अस्सी के दशक और खासकर उदारीकरण-बाजारीकरण की आँधी के बाद बेशक जिस कच्ची-पक्की जमीन पर उसके पाँव थे वह भी उखड़ने लगे। पहले निजी स्कूलों की न्यून उपस्थिति में कमोबेश सभी समूहों-वर्गों के बच्चे इसी व्यवस्था से निकलते थे। पर इस नये दौर में यह द्वैध अलिखित रूप से स्थापित हो गया कि संविधान की भावना और शैक्षिक दस्तावेजों में बार-बार सबके लिए समान स्कूली प्रणाली की प्रतिबद्धता के बावजूद शिक्षा की कई परतें होंगी।


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“I am disappointed and in dilemma what should I do”

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For a profession to attract outstanding students, it has to be desirable. It’s not difficult to understand what desirability is. We just need to ask a simple question… What are our outstanding students aspiring for? With common sense, one can answer- It’s medical, engineering and civil services. What makes these professions desirable? It is…regular and decent pay, greater career mobility, the opportunity for global exposure and a sense of agency.


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कक्षा में शिक्षक

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किसी कक्षा में एक शिक्षक क्या करे और क्या न करे इस विषय पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है।मेरी समझ से यह विषय इतना सरल भी नहीं है न ही इसे इतने हल्के में लिया जाना चाहिये। बल्कि शिक्षाविदों, शिक्षकों व बच्चों के दायरे में आने वाले इस महत्वपूर्ण विषय पर इससे प्रभावित होने वाले लोगों द्वारा गहन विचार विमर्श करके सहमति बनाई जानी चाहिए। इसे सरल मैं इसलिए नहीं मान रहा क्योंकि इसमें बाल मनोविज्ञान से लेकर शैक्षिक सिद्धांतों, दर्शन व व्यवहारिक ज्ञान का समावेश भी होता है। एक शिक्षक के रूप में अपने वर्षों के अनुभव से मैं इस संबंध में जो कुछ समझ बना पाया हूँ उसके अनुसार एक शिक्षक कक्षा में जो कार्य व्यवहार करता है उसे तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहला है कक्षा कक्ष प्रबंधन, दूसरा नियोजन के अनुरूप पाठ कार्यान्वयन और तीसरा आकलन व्यवहार


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