जब हम बच्चों की प्रशंसा करना भूल जाते हैं

जब हम बच्चों की प्रशंसा करना भूल जाते हैं

Posted on: Sun, 03/08/2026 - 13:10 By: admin
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जब हम बच्चों की प्रशंसा करना भूल जाते हैं?

 

किसी भी स्कूल की असली पहचान उसकी इमारत, परीक्षा परिणाम या भव्य कार्यक्रमों से नहीं होती, बल्कि उस वातावरण से होती है जहाँ बच्चों की मेहनत को देखा, समझा और सराहा जाता है। स्कूल वह जगह होती है जहाँ बच्चे न केवल किताबों से सीखते हैं, बल्कि अपने आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और जीवन मूल्यों की नींव भी रखते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, कई शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों की उपलब्धियाँ धीरे-धीरे 'सामान्य बात' मान ली जाती हैं। पढ़ाई में अच्छा करना, खेल में आगे बढ़ना, अनुशासन बनाए रखना, नियमित उपस्थिति रखना— ये सब प्रयास कई बार बिना किसी प्रतिक्रिया के गुजर जाते हैं।

बच्चे शुरुआत में बहुत उत्साह से मेहनत करते हैं। वे बेहतर अंक लाने की कोशिश करते हैं, गतिविधियों में भाग लेते हैं, अपने व्यवहार में सुधार लाते हैं और जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। लेकिन जब लगातार प्रयासों के बावजूद उन्हें न शब्दों में सराहना मिलती है, न मंच से पहचान, न कोई छोटा-सा प्रमाणपत्र, तब उनके भीतर एक चुप-सी निराशा जन्म लेने लगती है। वे खुलकर शिकायत नहीं करते, लेकिन मन ही मन यह सोचने लगते हैं कि 'अगर मेरी मेहनत दिखाई ही नहीं देती, तो फिर कोशिश करने का क्या लाभ?'

मनोविज्ञान कहता है कि प्रशंसा केवल भावनात्मक संतोष नहीं देती, बल्कि वह बच्चों के भीतर सीखने की प्रेरणा को जीवित रखती है। जब किसी बच्चे के छोटे प्रयास को भी पहचाना जाता है, तो वह अपने भीतर यह विश्वास विकसित करता है कि मेहनत का मूल्य होता है। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अगली बार और बेहतर करने की कोशिश करता है। लेकिन जब कोई बच्चा लगातार अच्छा करता रहे और उसे अनदेखा कर दिया जाए, तो धीरे-धीरे उसकी ऊर्जा कम होने लगती है। वह मेहनत तो करता है, लेकिन भीतर से प्रेरित नहीं रहता।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब मेहनती बच्चों को लगता है कि स्कूल में उनकी सफलता को सामान्य मान लिया गया है, जबकि गलती करने वाले बच्चों पर तुरंत ध्यान जाता है। इससे एक गलत संदेश जाता है — कि अच्छा करना कोई विशेष बात नहीं है। यह सोच बच्चों के भीतर प्रतिस्पर्धा की स्वस्थ भावना को कमजोर करती है और धीरे-धीरे सीखने को बोझ में बदल देती है।

यह भी समझना जरूरी है कि प्रशंसा का अर्थ हमेशा बड़े पुरस्कार, महंगे मेडल या भव्य मंच नहीं होता। कई बार कक्षा में दो सच्चे शब्द — 'तुमने बहुत मेहनत की है', 'मुझे तुम पर गर्व है', 'अच्छा प्रयास' — किसी बच्चे के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार बन जाते हैं। कभी नोटबुक पर लिखी एक पंक्ति, कभी प्रार्थना सभा में नाम लेकर बुलाना, कभी प्रमाणपत्र देकर सराहना करना। ये छोटे-छोटे प्रयास बच्चों के मन में गहरी सकारात्मक छाप छोड़ते हैं।

प्रशंसा केवल उन बच्चों के लिए जरूरी नहीं होती जो पहले से उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हों, बल्कि उनके लिए भी उतनी ही आवश्यक होती है जो संघर्ष कर रहे होते हैं। जब प्रयास को परिणाम से पहले सराहा जाता है, तो कमजोर बच्चे भी खुद को असफल नहीं, बल्कि प्रगति की राह पर चलता हुआ महसूस करते हैं। इससे उनमें सीखने की इच्छा बनी रहती है और वे हार मानने के बजाय आगे बढ़ने का साहस जुटाते हैं।

जब स्कूलों में उपलब्धियों को पहचानने की संस्कृति विकसित होती है, चाहे वह शैक्षणिक हो, खेलकूद हो, उपस्थिति हो, व्यवहार हो या जिम्मेदारी, तब बच्चों को यह महसूस होता है कि वे केवल अंक लाने वाली मशीन नहीं हैं, बल्कि विद्यालय समुदाय के सम्मानित सदस्य हैं। इससे स्कूल का वातावरण अधिक सकारात्मक, सुरक्षित और प्रेरणादायक बनता है। बच्चे डर से नहीं, बल्कि विश्वास से सीखते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों की सफलता को केवल बड़े परिणामों से नहीं, बल्कि छोटे प्रयासों से भी जोड़कर देखें। क्योंकि हर बच्चा पदक जीतने वाला नहीं बन सकता, लेकिन हर बच्चा बेहतर इंसान जरूर बन सकता है, अगर उसकी मेहनत देखी जाए, सुनी जाए और सराही जाए।

अंततः यही कहा जा सकता है कि प्रशंसा कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि शिक्षा की आत्मा है और यदि हम शिक्षक, प्रधानाचार्य या किसी भी शैक्षणिक भूमिका में हैं, तो यह हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि हम स्वयं से समय-समय पर यह प्रश्न करें — कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी व्यस्तता, औपचारिकताओं या अपेक्षाओं के बीच कोई बच्चा, जो प्रशंसा का अधिकारी है, हमारी नजरों से अनदेखा रह गया हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी छोटी-सी प्रगति, उसका अनुशासन, उसकी निरंतरता या उसका संघर्ष चुपचाप बीत गया हो? हमें सजग रहना होगा कि हमारे विद्यालय में कोई भी प्रयास छोटा न समझा जाए और कोई भी बच्चा स्वयं को अदृश्य महसूस न करे क्योंकि जब हम एक बच्चे की मेहनत को पहचानते हैं, तो हम केवल उसे सराहते नहीं, बल्कि उसके भीतर विश्वास का एक दीप जला देते हैं और वही दीप उसके भविष्य की दिशा तय करता है।

 

नेहा गुप्ता