पढ़ना: दुनिया को नए फ्रेम में देखना
एक ऐसे समय में, जब रील्स और सोशल मीडिया फ़ीड्स हमारे जीवन को चारों ओर से घेरे रहते हैं—थोड़ा सा भी मौका मिलता है और हम फ़ोन पर स्क्रॉल करने लगते हैं। खत्म न होने वाली फ़ीड्स हमें घेर लेती हैं और हम उनमें उलझे रहते हैं। ऐसे में पढ़ना पीछे छूटता चला जाता है।
एक शिक्षक होने के नाते भी, और एक पाठक के रूप में भी, पढ़ने की केंद्रीय महत्ता को लेकर मैं हमेशा उत्साहित रहा हूँ। नया साल अक्सर लोगों को यह सोचने का मौका देता है कि थोड़ा पढ़ लिया जाए। हर साल मैं कोशिश करता हूँ कि इस संदर्भ में कुछ लिखा जाए—ताकि लोगों को यह सोचने में मदद मिले कि वे कैसे पढ़ें और कैसे पढ़ते रहें।
इसमें कोई शक नहीं है कि बहुत कम लोग सीखने के लिए पढ़ते हैं। दुर्भाग्यवश, पढ़ने का रिश्ता परीक्षा और नौकरी से जोड़ दिया गया है। और जैसे ही ये दोनों जीवन से खत्म होती हैं, पढ़ाई भी खत्म हो जाती है। फिर सवाल उठता है—पढ़ें क्यों?
जब हम बच्चों से भी कहते हैं कि पढ़ो ताकि परीक्षा में नंबर आएँ, नौकरी मिल जाए—तो ये बातें अब लगभग खोखली लगने लगी हैं। खासकर ऐसे दौर में, जब आसपास कई लोग ग्रेजुएट हैं, मास्टर्स हैं, फिर भी उनके पास नौकरी नहीं है। ऐसे में बच्चे और युवा स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि फिर पढ़ने का मतलब क्या है।
खैर, ‘पढ़ना’ एक बहुत व्यापक शब्द है। यहाँ मैं किताब पढ़ने की बात कर रहा हूँ और अपनी बात को इसी तक सीमित रखूँगा। पढ़ने के कई अर्थ और लाभ हो सकते हैं, लेकिन जिस पहलू पर मैं अभी बात करना चाहता हूँ, वह यह है कि पढ़ना हमें मल्टीपल फ्रेम देता है—और हमारे जीवन में इसकी बहुत अहमियत है।
अब सवाल यह है कि यह मल्टीपल फ्रेम क्या होता है?
आपने देखा होगा, जब हम चश्मे की दुकान पर जाते हैं, तो आँखों की जाँच के लिए हमें एक डमी फ्रेम पहनाया जाता है। दुकानदार उसमें अलग-अलग शीशे बदलता रहता है और हमसे पूछता है—अब कैसा दिख रहा है? जैसे-जैसे शीशा बदलता है, हम चीज़ों को अलग तरह से, कभी बेहतर, कभी ज़्यादा साफ़ देख पाते हैं। यही है फ्रेम।
हम सब जिस समाज, परिवार और समुदाय में पले-बढ़े होते हैं, वहाँ से हमें जीवन को देखने के कुछ तयशुदा फ्रेम मिल जाते हैं—रिश्तों को, घटनाओं को, सामाजिक फ़ेनोमेना को समझने के लिए। आमतौर पर लोग इन्हीं फ्रेम्स के सहारे जीवन चला लेते हैं, लेकिन वह एक तरह से घिसा-पिटा हो जाता है।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। पारंपरिक फ्रेम पुरुष और महिला के संबंधों को बहुत सीमित दायरों में देखता है। परिवार के भीतर—बहन, माँ, पत्नी जैसे स्थापित रिश्तों में। लेकिन आज पुरुष और महिला कलीग भी हैं, को-वर्कर हैं, पार्टनर्स हैं, सहपाठी हैं, को-राइटर्स हैं, को-रिसर्चर्स हैं। वे नए सामाजिक और आर्थिक संदर्भों में साथ काम कर रहे हैं। ऐसे रिश्तों को समझने की क्षमता पारंपरिक फ्रेम के पास अक्सर नहीं होती। यह सिर्फ़ एक उदाहरण है—ऐसे ही फ्रेम हम जीवन के कई दूसरे क्षेत्रों में भी देख सकते हैं।
पढ़ना क्या करता है?
जब हम अलग-अलग किताबें पढ़ते हैं, तो हमारे दिमाग में लगातार नए फ्रेम बनते रहते हैं—समाज और जीवन की सच्चाइयों को अलग-अलग एंगल से देखने के फ्रेम। यही वह फर्क है जो पढ़ने वालों और नही पढ़ने वालों के बीच दिखाई देता है। जो लोग नहीं पढ़ते, वे अक्सर उन्हीं सीमित फ्रेम्स में जीवन देखते रहते हैं जो समाज, परिवार और धर्म ने उन्हें दिए होते हैं—और उन्हीं में जीते रह जाते हैं।
पढ़ने की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह हमें मल्टीपल फ्रेम देता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि पढ़ना हमें equip करता है। मान लीजिए आप किसी कठिन परिस्थिति—किसी बैटलफ़ील्ड—में हैं। आपके पास विकल्पों का होना, औज़ारों का होना, आपको मज़बूत बनाता है। मल्टीपल फ्रेम हमें चीज़ों को कई कोणों से देखने और समझने की क्षमता देता है।
और जब कोई व्यक्ति इस अनुभव से गुजरता है, तो यह एक liberating feeling होती है—यह मुक्त करने वाला अनुभव है। पारंपरिक फ्रेम कई बार हमें जकड़ कर रखता है, दुख में बनाए रखता है। हमें बाहर निकलने के विकल्प दिखाई ही नहीं देते। लेकिन जैसे ही कोई ऐसा फ्रेम मिलता है, जिसके ज़रिए हम किसी स्थिति को अलग नज़रिए से देख पाते हैं—उसी क्षण हम भीतर से मुक्त महसूस करने लगते हैं।
यह बात मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। जो लोग लगातार पढ़ते हैं, उनका भी यही अनुभव रहा है। इसलिए अगर यह सवाल है कि हमें लगातार पढ़ते क्यों रहना चाहिए, तो इसका एक जवाब यह है—क्योंकि पढ़ना हमारे दिमाग में मल्टीपल फ्रेम के निर्माण में मदद करता है। और यही फ्रेम हमारी ज़िंदगी को ज़्यादा समझदार, ज़्यादा समृद्ध और ज़्यादा खूबसूरत बनाते हैं।
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