शिक्षक प्रशिक्षण की विफलता: समस्या सेवाकालीन कार्यक्रमों में नहीं, सेवा-पूर्व शिक्षा में है

शिक्षक प्रशिक्षण की विफलता: समस्या सेवाकालीन कार्यक्रमों में नहीं, सेवा-पूर्व शिक्षा में है

Posted on: Sun, 03/23/2025 - 14:54 By: admin
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शिक्षक प्रशिक्षण की विफलता: समस्या सेवाकालीन कार्यक्रमों में नहीं, सेवा-पूर्व शिक्षा में है

 

पिछले सप्ताह, रोहित धनकर, जो कि शिक्षा के क्षेत्र के एक शानदार विचारक हैं और अमूमन लोगों से सोशल मीडिया के माध्यम से संवाद करते हैं, ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया। वे  लिखते हैं:

“पिछले कई दशकों का अनुभव बताता है कि सेवाकालीन क्षमता विकास कार्यक्रमों से बच्चों की अधिगम उपलब्धि में कोई विशेष सुधार नहीं हो पाता। ऐसा क्यों है? इसके क्या कारण हो सकते हैं?”

मेरा अनुभव कई दशकों का तो नहीं है, लेकिन एक दशक का जरूर है, और मैं उनकी बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूं। प्रशिक्षण कराने वाली संस्थाओं द्वारा आयोजित प्री-टेस्ट और पोस्ट-टेस्ट से प्राप्त परिणामों को अगर दरकिनार कर दिया जाए, तो वास्तव में सेवाकालीन क्षमता विकास कार्यक्रम बच्चों की अधिगम उपलब्धि में कोई विशेष सुधार नहीं कर पाते।

लेकिन गहराई से विचार करने पर मुझे लगता है कि समस्या सेवाकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नहीं, बल्कि शिक्षकों को तैयार करने वाले सेवा-पूर्व कार्यक्रमों में निहित है। एक आसान सा सवाल हम पूछ सकते हैं—हमारे शिक्षक आखिर पढ़ाई कहां से करके आ रहे हैं?

यदि हम अपने आसपास एक छोटा सा सर्वेक्षण करें, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ज्यादातर शिक्षकों की पढ़ाई-लिखाई किसी औसत दर्जे के कॉलेज में हुई है, जहां कुछ प्रश्नों के उत्तर रटकर परीक्षा पास कर लेना सामान्य बात होती है। हम सब जानते हैं कि सेवा-पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था हमारे देश में लगभग समाप्त हो चुकी है। देशभर में कुछ मुट्ठीभर कॉलेज हैं, जहां आज भी गंभीरता के साथ सेवा-पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में यह सिर्फ डिग्री खरीदने जैसा बनकर रह गया है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी इस समस्या को स्वीकार करते हुए इसे सुधारने के लिए सुझाव दिया है और स्टैंडअलोन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों को बंद करने की सिफारिश की है

देशभर में 28 करोड़ स्कूली बच्चों को करीब 1 करोड़ शिक्षक पढ़ा रहे हैं। अलग-अलग स्तरों पर हर साल भारत को करीब 3 लाख नए शिक्षकों की जरूरत होती है। लेकिन जहां शिक्षकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है, ऐसे चुनिंदा संस्थानों से हर साल शायद ही 10,000 शिक्षक तैयार होते हैं। तो बाकी के 2,90,000 शिक्षक कहां से पढ़कर आ रहे हैं?

हमारी ध्वस्त हो चुकी शिक्षक शिक्षा व्यवस्था से निकले कमजोर शिक्षक, शिक्षा प्रणाली को और कमजोर बना रहे हैं। ऐसे में सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम उनके भीतर कोई बड़ा बदलाव लाने में असमर्थ सिद्ध होते हैं।

हाल ही में सुनील मेमोरियल लेक्चर के दौरान, प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने कहा कि "उच्च शिक्षा शिक्षा व्यवस्था का हृदय है, वहीं से रक्त संचारित होता है। अगर किसी कक्षा में कोई बेहतरीन शिक्षक मौजूद है, तो निश्चित रूप से उसका संबंध उच्च शिक्षा से जुड़ा हुआ होगा।"

इस सवाल को एक और दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है—आखिर हम स्कूली शिक्षा से चाहते क्या हैं? एक सामान्य उत्तर होगा—बच्चे अधिक से अधिक अंक लाकर उत्तीर्ण हों।

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की कोई आवश्यकता नहीं है। कोचिंग संस्थान, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से कहीं अधिक प्रभावी तरीके से हमारे समाज को इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता कर रहे हैं। इस परीक्षा केंद्रित शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम, शिक्षाशास्त्र (पेडागॉजी) जैसे विषयों की कोई खास भूमिका ही नहीं बचती, क्योंकि शिक्षक इसी प्रणाली के भीतर काम कर रहे हैं, जहां उनका प्राथमिक लक्ष्य बच्चों को ज्यादा से ज्यादा नंबर दिलाकर अगली कक्षा में भेजना रह गया है। इस संदर्भ में, सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम अप्रासंगिक हो जाते हैं।