यात्रा वृत्तांत: नैनीताल के पास खूबसूरत पहाड़ी वादियों में बसा घुघुती होमस्टे।

यात्रा वृत्तांत: नैनीताल के पास खूबसूरत पहाड़ी वादियों में बसा घुघुती होमस्टे।

Posted on: Sun, 06/18/2023 - 08:57 By: admin
अगर बाहरी लोगों द्वारा जल्दी ही यहां जमीन की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है तो इन गांवों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, और उत्तर पूर्व के राज्यों में यह प्रतिबंध प्रभावी रूप से काम करता है, लेकिन उत्तराखंड में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर कोई रोक नहीं है। हाँ, उसकी मात्रा को सीमित कर दी गई है,लेकिन खरीदार लोग मात्रा बढ़ाने के कई उपाय ढूंढ़ निकालते हैं। पहाड़ों की खूबसूरती को वहां रचे बसे लोग जो वहां के पेड़-पौधों से परिचित हैं, जिन्होंने वहां के गीत-संगीत बनाए है

 

यात्रा वृत्तांत: नैनीताल के पास खूबसूरत पहाड़ी वादियों में बसा घुघुती होमस्टे।

 

तपती गर्मी में ठंडी हवा की चाहत इस मौसम में सबका ख्वाब होता है। कुछ चाहतें हकीकत में बदलती हैं, गर्मी के मौसम में पहाड़ों की सैर, हम चाहे तो इसे मिडिल क्लास प्रिविलेज कह सकते हैं! प्रिविलेज ही सही, बहरहाल मौका था उत्तराखंड में स्थित मुक्तेश्वर के समीप सोनकिया गाँव में कुछ समय बिताने का! दरअसल मेरे एक मित्र वहां करीब एक महीने से रह रहे हैं और उस जगह की तारीफ सुनकर हम से रहा नहीं गया और हम भी सोनकिया के लिए निकल पड़े!

 

पर्यटक पहाड़ों की यात्रा को अक्सर प्रचलित शहरों जैसे मसूरी, नैनीताल, शिमला, मनाली, इत्यादि से जोड़कर देखते हैं। उच्च गुणवत्ता वाली चौड़ी सड़कों का जाल इन पहाड़ी शहरों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ता है। लोगों के साथ-साथ कारों की बढ़ती संख्या गर्मी के महीनों में इन पहाड़ी शहरों के लिए एक मुसीबत सी बन जाती है।कई पर्यटक मानते हैं कि इन पहाड़ी शहरों में मैदानी शहरों की तुलना में अब कोई खास अंतर नहीं रह गया है। वहीं, भीड़-भाड़, शोर-शराबा, पंखे और एयर कंडीशनर की जरूरत आदि भी पहाड़ी शहरों में होती है। कई मौकों पर गर्मी के महीनों में इन शहरों में आने वाले पर्यटकों की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि स्थानीय प्रशासन को गाड़ियों के प्रवेश पर रोक लगानी पड़ती है।

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इन शहरों से दूर पहाड़ों के गांव धीरे-धीरे पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र बन रहे हैं। लेकिन शहरों में रहने वाले सुविधा भोगी वर्ग, कच्ची सड़कें, बिना पंखों और एयर कंडीशनर के कमरे, बिना फ्रिज़ के रसोई, बंद पानी की बोतलों की जगह बहती हुई नदियों से लाए गए पीने का पानी, और अंधेरे को देखकर अक्सर घबरा जाते हैं। सोनकिया में हमारे लिए यही बातें आकर्षण का मुख्य केंद्र था!

इस गांव में रहने वाले नंदन डंगवाल ने हाल ही में अपने दो भाइयों विजय और दिनेश के साथ मिलकर घुघुटी होमस्टे बनाया है और तीनों भाई मिलकर इसे चला रहे हैं। शनिवार की सुबह हम घर से करीब 7:00 बजे निकले थे और रात के लगभग 7:00 बज गए थे जब हम सोनकिया पहुंचे। गांव का सही स्थान बताने में गूगल मैप थोड़ी गलती कर देता है, इसलिए दिनेश जी हमें मुख्य सड़क पर ही लेने के लिए पहले ही आ गए थे। भालु गाड डैम के पास हमें दिनेश ने मिल गए और वहां से लगभग 7 किलोमीटर दूर तक हमें घुघुटी होमस्टे तक ले आए।

गाड़ी को घर से करीब 200 मीटर दूर गांव की मुख्य सड़क पर ही पार्क करना था, और वहां से एक छोटा सा लेकिन खूबसूरत ट्रैक शुरू होता है। ट्रैक के दोनों ओर आड़ू, खुमानी, पल्प, सेब, नाशपाती आदि के अनगिनत पेड़ थे! पके हुए आड़ू के फल दृश्य को अद्भुत बनाते हैं! होमस्टे पहुंचते ही शाम ढल चुकी थी, रात का अंधेरा और तेज़ी से बहती ठंडी हवा, ऐसा लग रहा था मानों हम किसी सपनों के जगह पर आ गए हैं। रात के करीब 9:00 बजे जब ठंड ज्यादा हुई, तो हमारे लिए बोनफायर का इंतजाम किया गया, एक तरफ दिल्ली में उस दिन तापमान 45 डिग्री से ऊपर था, और दिल्ली से करीब 350 किलोमीटर दूर रात के 9:00 बजे हम आग के पास बैठकर उसकी गर्माहट का लुफ्त उठा रहे थे! दिनेश और विजय ने म्यूजिक का भी प्रबंध किया। हमने आग्रह करके उसे बंद करवा दिया। आसपास के जंगलों से आने वाली कीड़े-मकोड़ों की आवाज, बीच-बीच में दूर से आती जंगली जानवरों की आवाज, हमारे कानों के लिए इससे खूबसूरत कोई संगीत नहीं हो सकता था।

 

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अगली सुबह, हम अपने मित्र, जिनकी सलाह पर हम यहां आए थे, से मिलने निकले। वे करीब 1.5 किलोमीटर दूर उसी गांव में एक दूसरे होमस्टे में ठहरे हुए थे। सुबह की इस सैर को मैं अपने अब तक के जीवन की सबसे खूबसूरत मॉर्निंग वॉक में गिनना चाहूंगा! सूरज की चमकती रोशनी, ठंडी हवा और फलों से भरे पेड़ों के बीच चलना, मेरे लिए तो स्वर्ग की यही कल्पना है। कई फल अभी पक रहे थे, और मैंने कुछ फलों को पहली बार पेड़ों पर देखा था। पल्प, नाशपाती, और सेब के पेड़ों के बीच मैं अक्सर कंफ्यूज हो जाता था। दिनेश जी, जो हमारे साथ चल रहे थे, लगातार हमें इन पेड़ों और फलों के बारे में बता रहे थे और यह बता रहे। आड़ू और खुमानी पक रहे थे, और इन्हें पहचानना आसान था! खुमानी पेड़ों पर बेर के फल की तरह लगती है! आम, लीची, कटहल और जामुन जैसे फलों को देखकर, तोड़कर और खाते हुए मैं बड़ा हुआ, मन अचानक आड़ू और खुमानी के प्रति सम्मोहित हो उठता है। आड़ू अपने रूप से और खुमानी अपने स्वाद से मुझे बहुत प्रभावित करता है।

In the village

हमारे मेजबान विजय, होमस्टे की मुख्य जिम्मेदारी संभालते हैं। खाना बनाने से लेकर मेहमानों की अन्य सभी आवश्यकताओं का ध्यान वे बखूबी रखते हैं। अपने ही खेतों में उगे आलू, गोभी, प्याज, मूली और दाल का खाना बनाने के व्यंजन के रूप में ज्यादा से ज्यादा उपयोग करते हैं। शाम को हमें गांव की यात्रा पर ले जाते थे, रास्ते में जो भी लोग मिलते उनसे हमारा परिचय होता था, थोड़ी बहुत बातचीत होती थी। अगर किसी के घर के सामने से गुजर रहे होते तो वे चाय पिलाने की जिद कर बैठते थे, और कई जगह फिर हम मान भी जाते! अगर कहीं चाय नहीं पी तो वे जाते-जाते आड़ू के 2-4 फल हाथ में थमा देते थे! यहां के सभी लोगों द्वारा पूछे जाने वाले एक सुंदर सवाल था,

"कैसा लग रहा है यहाँ आकर?"

 

सामुदायिक जीवन, जिसमें एक दूसरे के सुख और दुख में लोग हिस्सा लेते हैं, भारत के ग्रामीण परिवेश में अभी भी जीवंत है। मेरे विचार से पहाड़ों के गांवों में इसका और खूबसूरत रूप देखने को मिलता है। जिन दिन हम यहाँ से निकलने लगे, कुछ लोग आड़ू, कोई खुमानी, किसी ने आलू तो किसी ने मड़ुवे का आटा हमें भेंट किया । इन वस्तुओं के तो नाम होते हैं, लेकिन विदा करते समय हमारे साथ आने वाले वहां के कुछ लोगों की आंखों में जो प्यार और सम्मान होता है, उसे तो क्या ही नाम दें।

 

पहाड़ों को निहारना, होमस्टे के पास बहती हुई नदी में कल-कल करते हुए पानी की ध्वनि सुनना, नदी में नहाना और नदी का पानी पीना, फलों के बगीचों में घूमना, पगड़ंडियों से आते-जाते स्कूली बच्चों से बात करना, खेतों में काम करती महिलाओं और पुरुषों के साथ बैठकर बातें करना, गांव के मंदिर में जाना, ये सब मेरे लिए वहां आकर्षण का मुख्य केंद्र था।

 

गांव के लोग बातचीत के दौरान यह बताने लगते थे... वह सामने वाला घर दिल्ली के किसी व्यक्ति ने बनाया है, और वह उधर जो दूर दिख रहा है, लखनऊ के व्यक्ति का है! आप भी थोड़ी जमीन खरीद लीजिए! ये वाक्य जो एक पल में आतिथ्य का अहसास कराता है, बहुत अच्छा लगता है!  लेकिन दूसरे ही पल इन पहाड़ों में बाहर से आने वाले लोगों द्वारा यहां जमीन खरीदकर उसके व्यवसायिक इस्तेमाल के बारे में सोचकर दिल बैठ जाता था। अगर बाहरी लोगों द्वारा जल्दी ही यहां जमीन की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है तो इन गांवों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, और उत्तर पूर्व के राज्यों में यह प्रतिबंध प्रभावी रूप से काम करता है, लेकिन उत्तराखंड में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर कोई रोक नहीं है। हाँ, उसकी मात्रा को सीमित कर दी गई है,लेकिन खरीदार लोग मात्रा बढ़ाने के कई उपाय ढूंढ़ निकालते हैं। पहाड़ों की खूबसूरती को वहां रचे बसे लोग जो वहां के पेड़-पौधों से परिचित हैं, जिन्होंने वहां के गीत-संगीत बनाए हैं, और जिनके पूर्वज वहां रहे हैं, वहीं इसे संजो सकते हैं।

जब हम वापसी की यात्रा पर थे, उसी दिन नीम करौली धाम में एक बड़ा आयोजन था। कई रास्ते बंद और डाइवर्ट कर
कर दिए गए थे, मुझे पहाड़ी रास्तों का कोई खास अनुभव नहीं था। मुझे चिंता थी कि कहीं भटक न जाऊं, मैं सुरक्षित और आराम से पहाड़ों से बाहर निकल सकूं, इस बात को ध्यान में रखते हुए विजय हमारे साथ भीमताल तक चले आए और हमें विदा किया! हमने फिर से वापसी का वादा किया और दिल्ली लौट आए!