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सामाजिक विज्ञान में अवधारणा की समझ

मुझे इस विषय की महत्ता अन्य विषयों की तुलना में कहीं अधिक लगती है। हो सकता है आप इससे सहमत ना हो, पर मेरे पास इसके लिए पर्याप्त तर्क है। संसार कभी भी केवल अविष्कारों, जानकारियों या परिभाषीय ज्ञान से संचालित या प्रभावित नहीं हुआ है, महत्वपूर्ण यह रहा है कि इनकी दिशा क्या थी? क्या है? और क्या होगी? यही कारण है कि जैसे-जैसे मनुष्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और तकनीकी दुनिया में आगे बढ़ता जा रहा है मानव – एक सभ्यता, एक प्रजाति और एक संस्कृति के रूप में पिछड़ता जा रहा है।
हर एक नया आविष्कार जैसे प्रकृति के दोहन व स्वयं मानव के पतन का एक नया मार्ग खोलता सा प्रतीत होता है। पर मैं फिर कहूंगी कमी ज्ञान में नहीं अपितु उसकी दिशा में है। सामाजिक विज्ञान विषय का अध्ययन व इसे अन्य विषयों के साथ समग्रता से जोड़ना इस समस्या का निदान हो सकता है। पर यहाँ एक गंभीर रुकावट है वही – ‘अवधारणा’ की।

Exploring and Promoting Pluralism in School

This is a chapter from the RRCEE’s collection, ‘Voices Unheard’. Murari Jha was a Teacher fellow at RRCEE, CIE, University of Delhi in the year 2013-14. He worked on the theme ‘Exploring and Promoting Pluralism in School’ as a part of his fellowship. Shailaja Modem, who teaches at Gargi College, University of Delhi mentored him. […]