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समावेशी समाज के लिए जरूरी है सरकारी स्कूलों का अस्तित्व।

पिछले वर्ष मैंने अपनी बेटी का दाखिला एक सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में करा दिया। अपनी बेटी को प्राइवेट स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में कराने का मेरा निर्णय सिर्फ़ आर्थिक कारणों से नहीं था। मैं चाहता था कि बेटी समाज की वास्तविकता और विविधता में रहकर सीखे। वह समझ सके कि हम जैसे मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से अलग ढर्रे पर चलने वाली दुनिया भी अस्तित्व में है। वह जान सके कि दुनिया की बहुरंगी वास्तविकताएं और जरूरतें हैं। लोगों का आचार- विचार- व्यवहार बहुत हद तक इन्हीं सबसे निर्धारित होता है। वह यह भी जान सके कि इनमें से कुछ भिन्नताओं को हम इंसानों ने ही स्वार्थवश गढ़ा है जो विषमता और अन्याय को बढ़ाती हैं। इनका नाश भी हमें ही करना है। वहीं वह यह भी समझे कि बहुत सी विविधताएं स्वभाविक हैं और वे हमारे जीवन को स्मृद्ध ही करती हैं।

बच्चे कोरे कागज नहीं

बच्चों को बच्चा तो समझा जाना चाहिये पर बच्चे का मतलब अनाड़ी नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि उन्हें हमें अपने परिवेश का जीवंत सामाजिक- साँस्कृतिक इकाई मानकर आगे बढ़ना होगा। एक ऐसी इकाई जो अपने अवलोकन, अवसरों के दोहन, गलतियों और प्रयासों से निरंतर सीखती है। सीखने की यह प्रक्रिया समता, स्वतंत्रता से पूर्ण वातावरण में संपन्न की जानी चाहिए। आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस इकाइयां ही न्याय और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक समष्टि का निर्माण करेंगी जोकि अभी तक विषमता, वर्चस्व और अन्याय पर टिकी हुई है।

“I am disappointed and in dilemma what should I do”

For a profession to attract outstanding students, it has to be desirable. It’s not difficult to understand what desirability is. We just need to ask a simple question… What are our outstanding students aspiring for? With common sense, one can answer- It’s medical, engineering and civil services. What makes these professions desirable? It is…regular and decent pay, greater career mobility, the opportunity for global exposure and a sense of agency.

Who the teachers are?

Why would parents pay a heed to a school’s outcry? They didn’t admit their children in a particular school because teachers teach their wards. That was not their concern. Neither school told them that it’s teachers who teach, not the infrastructure. Why should parents believe that teachers have a role in teaching or schools also have teachers?

शिक्षकों के गैर पेशेवर पहचान को बढ़ावा देती नई शिक्षा नीति।

पिछले दशकों में स्कूली शिक्षा का विस्तार हुआ है स्कूल जाने वाले उम्र के करीब करीब सभी बच्चे स्कूल में दाखिला लेते हैं। भारत में प्राथमिक कक्षाओं में NER100% तक पहुंच गया। लेकिन एक और विचित्र घटना इसके साथ साथ हो रही थी। जहां एक और शिक्षा का विस्तार हो रहा था वहीं दूसरी ओर शिक्षक के पेशेवर पहचान को महत्वहीन बनाया जा रहा था। एक ऐसा माहौल बनाया गया जहां बड़ी संख्या में गैर पेशेवर लोग भी शिक्षक की भूमिका में आ सकते हैं। ऐसा करने के पीछे मकसद यह रहा कि स्कूली शिक्षा पर होने वाले खर्च को घटाया जाए क्योंकि पेशेवर शिक्षक के वेतन की वजह से सरकारों पर खर्च का बोझ बढ़ता जा रहा था। तमाम ऐसे शोध करवाए गए जिससे यह साबित हो सके की गैर पेशेवर लोग भी जब शिक्षक बनते हैं तो वे बच्चों को बेहतर पढ़ाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में संसाधन तो बचाया जा सका लेकिन शिक्षा को नहीं। गुणवत्ता के नए मानक गढ़ दिए गए। लेकिन खोखले मानक अधिक दिनों तक टिक नहीं सकते है।आज हमारे सामने ऐसी परिस्थिति है जहां स्कूलों में 95- 97% नंबर लाने वाले बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। हमारे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अत्यधिक दबाव में जीते हैं।  कई तरह की मानसिक और व्यावहारिक असंगतियाँ उनके व्यक्तित्व में पैदा हो रही है। एक समाज के तौर पर हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।

Oh My God, Your Education Minister, Can’t Believe It !

“मैं अगर आपको कहूँ कि उस दूसरे कमरे में जाकर जेंटलमैन को बुला लाइये, अगर वहाँ तीन लोग खड़े हो, जिसमें से किसी एक ने सूट और टाइ पहन रखा हो तो आप सूट वाले को बुला लाएँगे। ये कैसे होता है, कब हमने जेंटलमैन की परिभाषा गढ़ दी” यह पहला मौका था जिसने मुझे […]