Reflection of a teacher on Teacher’s day

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By Alok kumar Mishra

शिक्षक दिवस पर एक शिक्षक के विचार

सोचता हूँ एक शिक्षक के रूप में शिक्षक दिवस को मुझे किस रूप में लेना चाहिए। क्या मुझे उत्सव के मूड में होना चाहिए ?, अपने विद्यार्थियों और समाज से अपने खुद के लिए और पूरे शिक्षक समुदाय के लिए आदर व सम्मान की इच्छा करनी चाहिए? या कुछ और ? अपने दस वर्षों से अधिक के शैक्षिक जीवन से सीखते हुए मैंने इस पर गहन तरीके से सोचा है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि चाहे किसी के लिए इसका कुछ भी मतलब हो पर एक शिक्षक के लिए यह आत्म चिंतन का अवसर है।


यह दिवस मुझे अपने जीवन में मिले अच्छे व प्रिय शिक्षकों को याद करते हुये यह सोचने का अवसर देता है कि क्या मैं उनके वे गुण अपने अंदर विकसित कर पाया हूँ जो उन्हें अच्छा और प्रिय बनाता था। इसमें कोई शक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी व्यवसाय, पहचान या स्थिति से जुड़ा हो वह आदर व सम्मान प्राप्त करना चाहता है। शिक्षक भी इसका अपवाद नहीं। पर एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हुए इसकी एक सीमा से ज्यादा चाहत भी नहीं करनी चाहिए । आखिर गरिमा के स्तर पर सभी समान हैं। यह समझना जरूरी है कि सम्मान मात्र इस नोबल माने जाने वाले पेशे से जुड़कर ही नहीं मिल सकता, बल्कि इसमें हमारा व्यवहार ही अंतिम निर्धारक शक्ति होता है।
यदि हम अपनी कक्षा में बच्चों की गरिमा का ख्याल रखते हैं, उनकी पहचान व जरूरतों को लेकर संवेदनशील रवैया इख़्तियार करते हैं, उन्हें समान अवसर देते हुए प्रेमपूर्वक शिक्षण करते हैं, कभी भी उन्हें गलत तरीके से सम्बोधित न करके उनके अधिकारों को सम्मान देते हैं तो फिर हमें बदले में आदर व सम्मान मिलने के बारे में सोचना ही नहीं होगा। वह अपने आप उनके मन व व्यवहार में हमारे लिए प्रकट होगा। बच्चे स्कूल में मिले अनुभवों को वैसे ही घर पर ले जाते और अभिव्यक्त करते हैं जिस तरह घर-परिवार में सीखे गये को स्कूल में । वह हमारे द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के बारे में माता-पिता व अभिभावकों को भी बताते ही हैं जो उनकी नजर में हमारे प्रति धारणा का निर्माण करती है। कुछ शिक्षकों को मैंने यह शिकायत करते हुए पाया है कि बच्चे और उनके अभिभावक हमें पर्याप्त सम्मान नहीं देते। वस्तुतः यह शिक्षक के रूप में हमें अपने ऊपर ही सोचने को विवश करता है। वास्तव में बच्चे हमें वही लौटाते हैं जो हमसे प्राप्त करते हैं ।


हमारे सरकारी स्कूलों में अधिकांश बच्चे निम्न आय वर्ग से आते हैं जबकि अमूमन शिक्षक मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से होते हैं । यह वर्गीय अंतर शिक्षकों को बच्चों की पृष्ठभूमि व जीवन संघर्षों से अनभिज्ञ बनाती है। यदि शिक्षक संवेदनशील तरीके से इस अंतर को अपने बात-व्यवहार से पाटें न तो कक्षा में यह तनाव व असहजता का कारण बन जाता है। हमारे बहुत से बच्चे घर पर अपने माँ बाप के काम में हाथ बंटाते, पार्ट टाइम जॉब करते और कई तरह की दुश्वारियों का सामना करते हुए जीवन जीते हैं। उनसे अन्य बच्चों की तरह ही होमवर्क करके लाने, पाठ याद कर लेने, कक्षा में तत्पर बने रहने की अपेक्षा कभी-कभी गलत होती है। बहुत बार जाने-अंजाने हम शिक्षक अपने वर्गीय समझ की सीमा के वशीभूत उनके जीवन स्तर, बोली-भाषा व संस्कृति की अवहेलना, उपेक्षा या फिर उनका उपहास कर देते हैं जो उनमें हीन भावना, प्रतिरोध व जुड़ाव हीनता को जन्म देती है। शिक्षकों को बहुत संवेदनशील तरीके से विद्यार्थियों से पेश आना जरूरी है। उन्हें उनके नाम से और सम्मान पूर्वक बुलाने भर से वे शिक्षक के प्रति सहज हो जाते हैं। कुछ शिक्षकों को मैंने मध्याह्न भोजन देते समय बच्चों के साथ बहुत गलत तरीके से पेश आते देखा है। जैसे उन्हें झुंड में हांकना, ज्यादा या दुबारा माँग लेने पर अपमानित करना, लगातार टिप्पणियाँ करना आदि। हमें यह समझना होगा कि समावेशी, सम्मान आधारित, पोषणयुक्त, गुणवत्तापूर्ण माहौल बच्चों का अधिकार और हमारा उत्तरदायित्व है। यह उनके सशक्तिकरण का भी मामला है।


मुझे याद है कि तब शिक्षक बने मुझे मात्र एक वर्ष हुए थे जब मैंने एक बच्चे को उसके बिना नहाए स्कूल आने पर कक्षा में डाँट दिया था। उस समय तो बच्चे ने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुकाए लज्जित खड़ा रहा। किंतु कक्षा से निकलने के बाद वह मेरे पीछे-पीछे सीढ़ियों पर आया और बोला- ‘सर मैं आगे भी नहाकर स्कूल नहीं आ पाऊँगा क्योंकि जहाँ मेरा परिवार किराए के कमरे में रहता है वहाँ हमारे जैसे दस परिवारों के लिए एक ही बाथरूम और शौचालय है। सुबह उसमें बहुत भीड़ रहती है।’ उसकी बातें सुनकर कक्षा में किये गये व्यवहार के लिए मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे मैंने यह तो समझाया कि वह फिर सहूलियत के अनुसार दिन में जब समय मिले तब साफ- सफाई का काम कर ले, पर आगे से कभी इस तरह की सीधी व निर्णायक टिप्पणी करने से बचने लगा। वह बच्चा उस साल मेरी कक्षा में बेहतरीन परिणाम दर्शाने वालों में से एक रहा था।
यद्यपि हममें से ज्यादातर शिक्षक अक्सर अपने काम को पूरी प्रतिबद्धता से बखूबी पूरा करते हैं। फिर भी मेरा मानना है कि कई क्षेत्रों में हमें स्वयं में सुधार और बदलाव की आवश्यकता है। सिर्फ मेहनत करना ही काफी नहीं है बल्कि मेहनत सही दिशा में और सही तरीके से हो यह भी जरूरी है। हमें अपने पेशे में बेहतर होते रहने की जरूरत है। मेरी समझ से हमें इस दिशा में निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए। शिक्षक दिवस को स्वयं अपनी नजर में सार्थक बनाने के लिए मेरी नजर में हम शिक्षकों को ये सब अवश्य करना चाहिए-

  • एक शिक्षक के रूप में हमारा हित बच्चों के हित में ही है। हमें बच्चों के कल्याण को सर्वोपरि मानते हुए कार्य करना चाहिए।
  • एक शिक्षक के रूप में नये विचार, तकनीकी और पेडागाॅजी को सीखते रहना होगा।
  • कक्षा में समूहगत विविधताओं को सम्मान और स्पेस देना चाहिए जो देश की जरूरतों और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है।
  • विद्यार्थियों की व्यक्तिगत ज़रूरतों, समस्याओं और क्षमताओं को समझते हुए उन्हें भरपूर अवसर देना चाहिए।
  • संवैधानिक मूल्यों व आदर्शों को जीवन और व्यवहार में उतारना शिक्षक का कर्तव्य है।
  • एक शिक्षक को अपने विषय से संबंधित जानकारी को विकसित करते रहना चाहिए। इसमें नई किताबें पढ़ना, साझेदारी से सीखना, और अधिगम के लिए मिले अवसरों जैसे सेमिनार या कार्यशालाओं का फायदा उठाना शामिल है।
  • कक्षा में लोकतांत्रिक माहौल बनाते हुए बच्चों को प्रश्न पूछने, मन की बात कहने और भागीदारी के अवसर देना चाहिए। शारीरिक दंड, शाब्दिक अपमान या इसका भय पूरी तरह वर्जित होना चाहिए।
  • ‘बच्चे कोरे कगज हैं’ या ‘ बच्चे कच्ची मिट्टी होते हैं’ जैसे ‘व्यवहारवादी विचार’ अब शिक्षा जगत में पुराने और गलत माने जाने लगे हैं। वर्तमान में प्रचलित ‘कंस्ट्रक्टिव’ या ‘निर्माणवादी’ नजरिये से बच्चों को समाज के सक्रिय और अनुभव प्राप्त सम्मानित सदस्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसमें कक्षा में शिक्षक का काम ऐसे संदर्भ निर्मित करना होता है जहाँ बच्चे सक्रिय होकर और भागीदारी करके अपने लिए ज्ञान निर्माण स्वयं कर सकें। अतः बाल केन्द्रित गतिविधि आधारित शिक्षण अधिगम प्रक्रियाएँअपनाई जानी चाहिए।
  • बच्चे के भी अधिकार होते हैं जिन्हें जानना व मानना चाहिए
    अंत में एक और बात कहना चाहूँगा कि लोकतंत्र में सामूहिक नैतिक शक्ति का बहुत महत्व होता है। अपने सामूहिक और वृहत हित को साधने के लिए हम शिक्षकों को भी इस लोकतांत्रिक अधिकार और अवसर का प्रयोग करना चाहिए। हालाँकि ऐसा करते हुए हमें विशिष्ट राजनीतिक दलीय पक्षधरता नहीं दिखानी चाहिए। हाँ मानवीय मूल्यों और न्याय के पक्ष में आवाज़ जरूर उठाना चाहिए।
    इस सूची में हम और भी जरूरी और प्रगतिशील बातों को जोड़ सकते हैं। यदि हम ऐसा कर पाएँ और व्यवहार में उतार पाएँ तो इससे मिलने वाली संतुष्टि और खुशी हमें रोज शिक्षक दिवस का अनुभव कराएगी। अंत में सबको शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई।

आलोक कुमार मिश्रा
शिक्षक, सामाजिक विज्ञान
सरकारी विद्यालय, दिल्ली शिक्षा निदेशालय ।


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