Pedagogy of the oppressed by Paulo Freire

पुस्तक पर चर्चा सीरीज के 5वें अंक में बात करते हैं आज पॉलो फ़्रेंरे द्वारा लिखित किताब ‘पेडागोजी ऑफ द ओप्रेस्ड’ की। इस किताब को पढ़ते हुए इस बात का कल्पना करना मुश्किल है कि आप इसको समराइज कर पाएंगे। पूरी किताब ही पेडगॉजी के सिद्धांतों की एक समरी है। मैंने शायद पांचवी बार इस किताब को पढ़ा होगा लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि बोर हो रहा हूँ । हर बार इस किताब की पंक्तियों में छुपे हुए नई अर्थों को आप जान पाते हैं। अंग्रेजी का एक शब्द है ‘Iteration’. इसका मतलब होता है कि किसी बात को बार-बार इसलिए पढ़ना कि आप इसके अलग अलग परतों को जान पाएँ।

वैसे इस किताब से कुछ प्रसंगों को निकालकर और उसके बारे में चर्चा करना बहुत मुश्किल है क्योंकि हर प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन फिर भी यहां समय और जगह दोनों के सीमाओं को ध्यान में रखते हुए मैं कुछ प्रसंगों का ही जिक्र कर पाऊंगा।

शिक्षा व्यवस्था पर विचार करते हुए वर्तमान में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था को वे एक बैंकिंग मॉडल के रूप में देखते हैं। बैंकिंग मॉडल मानता है कि बच्चों के पास अपना कोई अनुभव, अपना कोई ज्ञान नहीं होता है और शिक्षक सब कुछ जानने वाला होता है और वह बच्चों के मस्तिष्क में ज्ञान जमा करता रहता है। और इस प्रक्रिया में वह बच्चों के पूरे अस्तित्व को ही नकारता है।यह प्रक्रिया एक बड़ी वजह हो सकती है कि क्यों स्कूली शिक्षा इतना बोझिल होता जा रहा है। बैंकिंग पर आधारित शिक्षा व्यवस्था के विकल्प के रूप में वह एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना करते हैं जहां प्रॉब्लम पोजिंग शिक्षा को आधार बनाया जाए। बच्चों की जिंदगी और उससे जुड़ी हुई समस्याओं के बारे में बातचीत हो, सीखने सिखाने का उसे आधार बनाया जाए। इसी संदर्भ वे लिखते हैं ‘They do not come to teach or to transmit or to give anything, but rather to learn, with the people, about the peoples’ world.’

हर तरह के संदर्भ में और शिक्षा के संदर्भ में खासकर वे डायलॉग के महत्व को बहुत रेखांकित करते हैं। वे मानते हैं कि डायलॉग दो व्यक्ति को बराबरी के स्तर पर लाता है । डायलॉग अलग-अलग स्तर पर संभव नहीं है। इसी संदर्भ में उनकी यह पंक्तियां कितनी बेहतरीन है ‘Leaders who do not act dialogically, but insist on imposing their decisions, do not organize the people—they manipulate them. They do not liberate, nor are they liberated: they oppress.’

क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए फ़्रेंरे मानते हैं की प्रेक्सीस बहुत महत्वपूर्ण है ।प्रेक्सीस कार्य और विचार की एक प्रक्रिया है जो साथ में चलती है । विचार कार्य को प्रभावित करता रहता है और कार्य विचार को प्रभावित करता रहता है। इस संदर्भ में वे कहते हैं। ‘Functionally, oppression is domesticating. To no longer be prey to its force, one must emerge from it and turn upon it. This can be done only by means of the praxis: reflection and action upon the world in order to transform it’

समाज में जो शोषक वर्ग है वह किस तरह समाज में यथास्थिति को बरकरार रखना चाहता है इसके बारे में लिखते हुए वह कहते हैं “It is accomplished by the oppressors depositing myths indispensable to the preservation of the status quo.”. देश में वर्तमान राजनीतिक संबंध में यह महत्वपूर्ण पंक्ति है। हमें इस बात का लगातार पता लगाते रहना चाहिए कि कहीं हमारे अंदर कोई मिथ डिपॉजिट नहीं कर रहा है।

और आप जो देखते हैं कि देशभर में स्कूली शिक्षा और अब यूनिवर्सिटी के स्तर पर जो शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है इसको बेहतर समझने के लिए हम फ़्रेंरे के इन बातों को एक फ्रेम के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। ‘I have already affirmed that it would indeed be naive to expect the oppressor elites to carry out a liberating education. But because the revolution undeniably has an educational nature, in the sense that unless it liberates it is not revolution’.

1968, में पहली बार यह पुस्तक पुर्तगीज भाषा मे लिखी हुई आयी। 2 साल बाद इसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ और फिर यह दुनिया भर में फैल गयी। दर्जनों अलग अलग भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है।हिंदी में भी उपलब्ध है।

इस कंटेंट को The teacher app के साथ मिलकर एक ऑडियो विजुअल फॉर्म में लाने की मैंने कोशिश की है लिंक यहाँ उपलब्ध है।

http://www.theteacherapp.org/courses/course-v1:Pedagogy+07+201804_Ped_07/courseware/5ba21115b01e44e89efd0cdbca822fef/8c5d6d5b5e8a4fd3bab619151f318710/

Leave a Reply

Your email address will not be published.