सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का विश्वास।

  1. ये लो सिर्फ संस्कृत और ड्राइंग में तुम पास हो, कहते हुए मैम बच्चे के हाथ में पीले कलर का रिपोर्ट कार्ड पकड़ाती है। बच्चा खड़ा है, थोड़ी सी उदासी उसके चेहरे पे झलक रही है। सामने मम्मी अपने दो और बच्चों के साथ बैठी हुई है।
    मम्मी से यहां साइन करवा लो, यह कहते हुए टीचर एक अटेंडेंस सीट बच्चे के हाथ में पकड़ा देती हैं। मम्मी पेन पकड़कर जैसे- तैसे साइन करने की कोशिश करती है।

थोड़ा ध्यान दीजिए आप इस पर, घर पे कुछ पढ़ता नहीं है

जी मैम आगे से मैं ध्यान रखूंगी।

  1. ये लो देखो गणित,अंग्रेजी और विज्ञान में तुम्हारा कितना कम नंबर है, तीन -तीन विषय में फेल हो। दूसरे बच्चे को रिपोर्ट कार्ड हाथ में पकड़ाते हुए मैम कहती है।
    मम्मी की आंखों में थोड़ा सा आंसू और उसी वक्त बच्चे के चेहरे पर वह एक थप्पड़ जड़ देती है,
    ट्यूशन भी लगा रखा है तुम्हारा फिर भी यह हाल है। आज से घर से कहीं भी बाहर निकलना बन्द। कहते हुए मम्मी रोती भी रहती हैं और बोलती भी रहती है।
    मैं क्या करूं मैडम, सुबह 6:00 बजे घर से निकल जाती हूँ । सब कुछ तैयार करके जाती हूँ, ताकि यह स्कूल जाए और बाद में पता चलता है कि स्कूल ही नहीं जाता है । शाम हो जाती है काम से घर वापस आते-आते। मैं पढ़ी-लिखी हूँ नहीं लेकिन पूरी कोशिश कर रही हूं कि यह किसी तरह पढ़ लें।

आगे एक पीटीएम के दौरान अभिभावकों द्वारा बताए हुए कुछ शब्दों को लिख रहा हूं।

3- पिछले साल ही इसके पापा की डेथ हो गई है तब से पता नहीं इसको क्या हो गया है । यह बिल्कुल नहीं पढ़ता है।और मैं क्या करूं मेरे ऊपर घर की भी जिम्मेदारी है बाहर की भी जिम्मेदारी है।
4 गाँव से फोन आ जाता है, सासू मां कहती है कि तुम घर में सबसे बड़ी बहू हो , शादी में तुम्हें 1 महीने पहले ही आना है । मैं इन तीन -तीन बच्चों को ले कर, घर चली जाती हूँ, कैसे पढ़ेंगे ये।

  1. मेरे दुकान पर अंग्रेज लोग भी आते हैं । वे इस से बहुत खुश होते हैं। वे कहते हैं कि तुम अगर ठीक से पढ़ लोगी तो अच्छा होगा लेकिन यह पढ़ती ही नही है।
  2. 1 महीने से इसके पापा अस्पताल में भर्ती हैं। मैं बहुत परेशान हो गयी हूँ। कई बार पूरा दिन इसको भी दुकान पर रहना पड़ता है लेकिन फिर भी मैं चाहती हूं कि यह किसी तरह पढ़ ले।
  3. अब यह इतनी बड़ी हो गई है इसको अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। इसके चार और छोटे-छोटे भाई बहन है। यह अगर पढ़ेगी नहीं तो बाकी बच्चे क्या सीखेंगे इससे।
  4. इसका पूरा ध्यान खेलों में लगा रहता है,बीच में टोकते हुए टीचर कहती है
    लेकिन यह बहुत अच्छा खेलती है

मैडम इससे क्या होगा असली बात तो पढ़ाई है ना जब पढ़ती ही नहीं है तो खेल कर क्या होगा।

  1. मैडम जरा इसे समझाओ इसकी लैंग्वेज घर में खराब हो रही है पापा से जबान लड़ाती है।

10- जितनी कॉपी मांगी सब दिया,यह जो भी मांगता है सब कुछ देती हूँ, फिर भी नहीं पढ़ता है।

मैं इंतजार करता रहा कोई भी एक पेरेंट्स यह तो बोलेगा कि अगर ये बच्चे नहीं पढ़ पा रहे हैं, इनके नंबर कम आए हैं, तो शायद टीचर ने ठीक से नहीं पढ़ाया हो, लेकिन मैं बस इंतजार करता रहा। मैंने एक बार फिर पूछ ही लिया
आपको लगता नहीं है कि टीचर ने ठीक से नहीं पढ़ाया होगा कभी ऐसा मन में नहीं आता है।
उनका जवाब था
बिल्कुल नहीं सर, टीचर बहुत अच्छे से पढ़ा रहे हैं, वे बहुत मेहनत कर रहे हैं।
इतना जबरदस्त विश्वास, इतनी बड़ी आस्था सरकारी शिक्षकों और सरकारी स्कूल के प्रति इन अभिभावकों का, मुझे आश्चर्य में डाल रहा था।
विख्यात डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर Michael Moore
कहते हैं कि इस तरह के पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों का एक अटूट विश्वास होता है संस्थाओं में। बदले में वे सिर्फ संस्थाओं से ईमानदारी की अपेक्षा रखते हैं।

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